Resham Ki Dori 🎀 : Raksha Bandhan Special – Rishabh Bhatt | Utsav Diary

उत्सव डायरी

रक्षाबंधन विशेष

रेशम की डोरी

पेड़ों की डाली में रेशम की डोरी, पत्तों को छू-छू के बेला सी फूला करती, सावन की झूलों में टहनी, बचपन के संग-संग झूला करती, गांवों की गलियों में आगे-पीछे वो नन्हीं सी कदमें डोला करती, भाई! भाई! आवाज़ लिए, कोयल के कूहु सी बोला करती, रातों में ऊंगली देकर, चंदा को मामा बोले, तितली को हाथों में लेकर, बादल की आंखे खोले, सूरज को भी आंख दिखाकर, बोले वो, मुझको परछाईं है, आंखें भी जो देख नहीं सकतीं, वो मेरा साया, भाई है, नटखट सी बनकर फिर, छुई-मुई सी मुरझाया करती, बरसातों की बूंदों को मुठ्ठी में भरकर, रिमझिम-रिमझिम गया करती, कभी मनाओ तो कहती- वो फूलों की डाली डोला क्यों? उड़ चलीं चिरईयां सारी, तूं बोल पपीहा बोला क्यों? गुनगुन-गुनगुन गीत पुरानी, सुन-सुन कर कहीं मयूरा नांच रहा, झरनों में झिलमिल-झिलमिल राग लिए, कोई झरोखें झांक रहा, आज सुहावन सावन आया, बह चली जगत में फिर पुरवाई, भेंट सहित सौभाग्य लिए, रेशम में बंधने को कई कलाई। 🌿 Written by Rishabh Bhatt 🌿 ✒️ Poet in Hindi | English | Urdu 💼 Engineer by profession, Author by passion

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राखी सिर्फ धागा नहीं होती…

रक्षाबंधन विशेष
कभी-कभी सोचता हूँ, एक पतला सा धागा आखिर इतना मज़बूत कैसे हो जाता है… कि वह बचपन संभाल लेता है, रिश्ते जोड़ देता है, और कई बार टूटते हुए इंसान को भी बाँध लेता है। रक्षाबंधन शायद सिर्फ त्योहार नहीं है… यह उन भावनाओं का दिन है, जहाँ बहनें सिर्फ राखी नहीं बाँधतीं, बल्कि अपना विश्वास किसी की कलाई पर रख देती हैं। और भाई… वो सिर्फ रक्षा का वचन नहीं देता, बल्कि यह एहसास देता है कि — "दुनिया चाहे जैसी भी हो जाए, आप अकेली नहीं हैं।" बचपन में राखी का मतलब कितना छोटा हुआ करता था ना… नए कपड़े, मिठाइयाँ, बहन का ज़बरदस्ती बड़ा वाला गिफ्ट माँगना, और भाइयों का जेब छुपाकर घूमना। लेकिन उम्र के साथ समझ आया… राखी का असली मतलब गिफ्ट नहीं, “साथ” होता है। वो साथ, जो बहन शादी के बाद भी हर कॉल में ढूँढती है। वो साथ, जो भाई अपनी परेशानियों के बीच भी “सब ठीक है” कहकर निभाता रहता है। हमारे समाज में अक्सर लड़कियों को बहुत जल्दी “समझदार” बना दिया जाता है। उन्हें सिखा दिया जाता है कि धीरे बोलो, संभलकर चलो, सीमाओं में रहो… लेकिन शायद कम लोग यह सिखाते हैं कि — एक लड़की सिर्फ किसी की बेटी या बहन नहीं होती, वो पूरे घर की धड़कन होती है। उसके होने से घर में आवाज़ें रहती हैं, रौनक रहती है, दुआएँ रहती हैं। और सच कहूँ… जिस घर में बेटियों की इज़्ज़त नहीं होती, वहाँ त्योहार सिर्फ कैलेंडर में आते हैं, दिलों में नहीं। रक्षाबंधन हमें सिर्फ रक्षा नहीं,सम्मान भी सिखाता है। क्योंकि एक लड़की को सुरक्षा देने से पहले, उसे सम्मान देना ज़रूरी है। उसकी बात सुनना ज़रूरी है। उसके सपनों को रोकने के बजाय, उनके साथ चलना ज़रूरी है। राखी तब सुंदर लगती है, जब भाई सिर्फ “रक्षक” नहीं, बल्कि अपनी बहन का सबसे बड़ा support system बनता है। महाभारत में भी एक पल ऐसा आया था… जब श्रीकृष्ण की उँगली से रक्त बहा। तब द्रौपदी ने बिना सोचे अपनी साड़ी का टुकड़ा फाड़कर उनकी उँगली पर बाँध दिया। वो कोई त्योहार नहीं था। कोई थाली नहीं थी। कोई मिठाई नहीं थी। बस एक भावना थी। और कहते हैं, उसी भावना का ऋण श्रीकृष्ण ने द्रौपदी के चीरहरण के समय निभाया। शायद रक्षाबंधन की जड़ वहीं कहीं छिपी है… जहाँ रिश्ता खून से नहीं, सम्मान और विश्वास से बनता है। आज जब राखियाँ बंधें, तो सिर्फ फोटो मत खिंचवाइएगा…एक वादा भी कीजिएगा। कि आप अपने घर की बेटियों को डर नहीं, उड़ान देंगे। चुप्पी नहीं, आवाज़ देंगे। बंधन नहीं, सम्मान देंगे, क्योंकि दुनिया की हर बहन सिर्फ सुरक्षा नहीं डिज़र्व करती… वो बराबरी, सम्मान और सुकून भी डिज़र्व करती है। और अंत में… अगर आपकी ज़िंदगी में कोई बहन है —सगी, cousin, दोस्त, या बस दिल से जुड़ा कोई रिश्ता… तो उसे यह एहसास ज़रूर दिलाइएगा कि उसकी मौजूदगी आपके जीवन को बेहतर बनाती है। क्योंकि कुछ रिश्ते भगवान बहुत फुर्सत से लिखते हैं… और “बहन” उन्हीं में से एक होती है। 🌸 सभी को रक्षाबंधन की ढेर सारी शुभकामनाएँ। ईश्वर हर बहन को सम्मान, सुरक्षा और मुस्कुराहट दे… और हर भाई को इतना अच्छा इंसान बनाए, कि उसकी कलाई पर बंधी राखी सच में गर्व महसूस करे। •💬 अगर आपको यह कविता अच्छा लगा हो, तो नीचे कमेंट में अपनी राय जरूर बताइए। •📲 इसे अपने दोस्तों और परिवार के साथ भी शेयर कीजिए। •📚 ऐसी ही कविताएँ, कहानियाँ और ब्लॉग पढ़ने के लिए हमारी वेबसाइट से जुड़े रहिए। ✨ •🌸 आपके स्नेह के लिए धन्यवाद — Team RishNova
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